डॉ. बी. आर. अंबेडकर द्वारा “अछूत: वे कौन थे और वे अछूत क्यों बने?”
प्रस्तावना
डॉ. भीमराव अंबेडकर अछूत पुस्तक सारांश भारत के सामाजिक इतिहास और जाति व्यवस्था की जड़ों को उजागर करता है। यह किताब बताती है कि कैसे मानव निर्मित प्रथाओं ने एक पूरे समुदाय को हाशिये पर धकेला और उनके अधिकार छीन लिए।
अंबेडकर ने ऐतिहासिक प्रमाणों, धार्मिक ग्रंथों और सामाजिक प्रथाओं का गहन विश्लेषण कर बताया कि अस्पृश्यता स्वाभाविक नहीं, बल्कि मानव निर्मित सामाजिक अन्याय है। यह पुस्तक न केवल इतिहास का दस्तावेज़ है, बल्कि समानता और न्याय की माँग का सशक्त आह्वान भी है।
पुस्तक का सारांश
अंबेडकर बताते हैं कि अछूत मूल रूप से बौद्ध थे, जो एक समय में सम्मानित और शांतिप्रिय जीवन जीते थे।
भारत में बौद्ध धर्म के पतन के बाद, इन समुदायों को ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने हाशिये पर धकेल दिया।
इन्हें मंदिरों, शिक्षा और समाज के मुख्यधारा जीवन से वंचित रखा गया।
पवित्रता और अपवित्रता के सिद्धांत को हथियार बनाकर, उच्च जातियों ने इन्हें अशुद्ध घोषित किया और गाँवों के बाहर बसने पर मजबूर किया।
पानी, रोजगार और बुनियादी अधिकारों से वंचित कर उन्हें सामाजिक रूप से अलग-थलग रखा गया।
डॉ. अंबेडकर का संदेश
डॉ. अंबेडकर स्पष्ट करते हैं कि:
अस्पृश्यता धर्म या ईश्वर की देन नहीं है, बल्कि यह एक सुनियोजित सामाजिक व्यवस्था है।
यह व्यवस्था लोगों को विभाजित और नियंत्रित करने का साधन थी।
हर व्यक्ति समानता, सम्मान और न्याय का हकदार है।
इस अमानवीय प्रथा को खत्म करना हर नागरिक का कर्तव्य है।
आज भी यह पुस्तक क्यों महत्वपूर्ण है?
जाति आधारित भेदभाव आज भी भारत के कई हिस्सों में मौजूद है।
यह पुस्तक हमें सिखाती है कि अन्याय को पहचानना और उसके खिलाफ खड़ा होना जरूरी है।
अंबेडकर के विचार आज भी सामाजिक न्याय, मानवाधिकार और शिक्षा के आंदोलनों को प्रेरित करते हैं।
लेखक परिचय: डॉ. भीमराव अंबेडकर (1891-1956)
भारतीय संविधान के निर्माता, समाज सुधारक और मानवाधिकारों के प्रबल समर्थक।
महू (मध्य प्रदेश) में एक दलित परिवार में जन्म, बचपन से ही भेदभाव का सामना किया।
कोलंबिया यूनिवर्सिटी और लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से उच्च शिक्षा प्राप्त की।
जीवनभर जातिगत भेदभाव के खिलाफ संघर्ष किया।
1956 में बौद्ध धर्म अपनाया और लाखों लोगों को समानता व सम्मान की राह दिखाई।
डॉ. बी. आर. अंबेडकर
(1891-1956)
निष्कर्ष:
“अछूत” सिर्फ इतिहास की कहानी नहीं है, बल्कि एक कार्रवाई का आह्वान है। यह हमें याद दिलाती है कि जब तक समाज में भेदभाव मौजूद है, तब तक अंबेडकर के विचार और संघर्ष प्रासंगिक रहेंगे।
